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प्रदेश में किसकी बनेगी सरकार, कौन बनेगा मुख्यमंत्री : NN81

 *प्रदेश में किसकी बनेगी सरकार, कौन बनेगा मुख्यमंत्री?*



*मतदाता की खामोशी  से राजनीतिक पंडितों  के सिर चकराए, प्रत्याशियों की बढ़ी धड़कने!*


*बूथवार मतदान के प्रतिशत को आधार मानकर लगा रहे कयास, जातिगत समीकरण की रही भूमिका*


*मतदान का बढ़ा हुआ प्रतिशत को क्या समझे, लाडली बहना, पुरानी पेंशन योजना बहाली की या किसान कर्जमाफी का वादा!*


धार जिला संवाददाता महेश सिसोदिया 


धार। मध्य प्रदेश में 17 नवंबर को विधानसभा चुनाव संपन्न हो चुके हैं। प्रत्याशियो के भाग्य ईवीएम मशीनों में बंद हैं। कल सुबह से नतीजे आना प्रारंभ हो रहे है लेकिन उससे पहले चुनाव लड़ने वाले सभी प्रत्याशियों और समर्थकों की धड़कने तेज हो गई हैं। सभी का ध्यान आने वाले चुनावी परिणाम पर है। राजनीतिक विश्लेषकों व चुनावी एक्जिट पोल में आए नतीजों से विरोधाभास देखने को मिल रहा हैं।

प्रत्याशियों ने बूथवार मत के प्रतिशत से लेकर जमीनी कार्यकर्ताओं के फीडबेक को लेकर आंकलन लगाया जा रहा है। वहीं, दूसरी ओर बढ़ा हुआ वोट का प्रतिशत भी उम्मीदवारों के लिए उलझन पैदा कर रहा है। हर कोई अपने हिसाब से आकड़ेबाजी से मनमाफिक समीकरण फिट करने में लगा हुआ है। कोई कहता है कि लाडली बहना योजना की लहर दिखाई दी तो कोई कह रहा है कि यह सत्ता विरोधी बदलाव की लहर से मत प्रतिशत बढ़ा हुआ है। कुछ का मत है कि कर्मचारियों ने पुरानी पेंशन को लेकर भी बंपर वोटिंग की है। वहीं राजनीतिक पंडितों का भी ध्यान इस तरफ ज्यादा नहीं गया है कि पिछले चुनाव में किसान कर्ज माफी का मुद्दा जमकर चला था और किसानों ने ही इस मुद्दे पर कांग्रेस की सरकार बनवा दी थी कांग्रेस का यह मुद्दा आज भी घोषणा पत्र में है और किसानों ने वोट भी किए हैं।


*मतदाता की खामोशी को पहचानना हुआ मुश्किल*


विधानसभा चुनाव में मतदाता रहा मौन, उसकी खामोशी को पहचानना हुआ मुश्किल, अच्छे अच्छे राजनीतिक विश्लेषको के सिर चकरा गए हैं, कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि किस पार्टी की लहर है या कोई मुद्दे के असर भी दिखाई नहीं दे रहा है। मतदाता पूरी तरह से खामोश रहा है और उसने अपना बहुमूल्य मत का निर्णय उम्मीदवारों के फार्म भरते ही कर लिया था। इस चुनाव में न कोई लहर, न कोई मुद्दा मतदाता ने अपना फैसला खामोशी के साथ सुना दिया। 


*त्रिकोणीय मुकाबले, बगावत वाली सीटे ही होगी निर्णायक*


जहां त्रिकोणीय मुकाबले हैं और वोट बैंक आपस में बंट गया है, कुछ जगह जातिगत समीकरण के कारण वोट बैंक प्रभावित हुआ है और अंदरूनी भीतरघात होने के कारण सीटे प्रभावित हो रही है। यही सीटे निर्णायक साबित हो सकती है और दिग्गज नेताओं की इज्ज़त दांव पर लगी हुई हैं। चुनाव परिणाम आश्चर्य जनक और चौकाने वाले आयेंगे। ऐसा लगता है कि 2018 जैसी स्थिति पुनः निर्मित हो सकती हैं। वर्तमान चुनावो में जो प्रदेश के प्रत्येक जिले व तहसील से जो आंकड़े सुनने को मिल रहे हैं उसके अनुसार भाजपा 105 से 110 सीटों तक पहुंच सकती हैं और कांग्रेस 115 से 120 सीटों का अनुमान लगाया जा रहा है, जो 2018 के चुनाव परिणाम जैसा ही है। ऐसी स्थिति में निर्दलीय प्रत्याशी की भूमिका फिर बढ़ जाती है और जो पार्टी को छोड़कर बगावत करके अन्य दलों के चुनाव चिन्ह से मैदान में उतरे थे, पार्टियां ऐसे उम्मीदवारों की घर वापसी करवाने की जुगत में शाम, दाम, दण्ड, भेद, अपनाते हुए, लोभ लालच देकर अपने जाल में फंसाने का प्रयत्न करेंगे। बगावती सीटे ही निर्णायक भूमिका में हो सकती हैं। एक एक सीट की लड़ाई देखने को मिलेगी।


*वोट का प्रतिशत बढ़ने के क्या कारण है?*


विधानसभा के चुनावो में जो वोट प्रतिशत बढ़ा है उसको लेकर सभी के अपने अपने तर्क है। सत्ता पक्ष इस मामले में लाड़ली बहना योजना से जोड़ रहे हैं वहीं विपक्षी कांग्रेस पार्टी बढ़े प्रतिशत को सत्ता विरोधी बदलाव की लहर या पुरानी पेंशन योजना की बहाली को लेकर कर्मचारियों ने बंपर मतदान किया है। बढ़े हुए मतदान को लेकर कांग्रेसी खेमे में खुशी की लहर दौड़ रही हैं। लाडली बहना योजना के कारण मत प्रतिशत बढ़ा है तो निश्चित ही भाजपा को लाभ मिलेगा। वहीं पुरानी पेंशन योजना का प्रभाव रहा तो कर्मचारियों का मत कांग्रेस के पक्ष में भी जा सकता है। किसानों के वोट भी  परिणामों को प्रभावित करेगे।


*सिंधिया की इज्जत चंबल संभाग में लगी दांव पर!*


चंबल क्षेत्र को ज्योतिरादित्य सिंधिया का गढ़ माना जाता है और लंबे समय से चंबल संभाग में सिंधिया का प्रभाव देखा गया है। अब वर्तमान स्थिति में राजनीतिक परिस्थियां बदल चुकी है। सिंधिया पूर्व में कांग्रेस के साथ थे अब बदले हुए राजनीतिक हालात में भाजपा के साथ आ जाने से कार्यकर्ताओ में भारी नाराजगी देखने को मिली। सर्वे रिपोर्ट में भाजपा को चंबल संभाग में भारी नुकसान बताया जा रहा है और यही सीटे भाजपा को सरकार बनाने में अड़चने पैदा कर रही हैं। चूंकि भाजपा का कार्यकर्ता सिंधिया खेमे से तालमेल बिठाने में असफल रहा। चंबल संभाग में सिंधिया को महत्व दिया गया जिससे भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओ को दरकिनार कर दिया है उसका परिणाम यह है कि चंबल संभाग में भाजपा को बड़ा नुकसान पहुंच सकता है। चंबल संभाग की जिम्मेदारी सिंधिया के कंधो पर हैं और सिंधिया की इज्जत दांव पर लगी हुई हैं।


*कौन बनेगा मुख्यमंत्री?*

कांग्रेस पार्टी सत्ता में आती हैं तो निश्चित रूप से एक ही नाम कमलनाथ का हैं जिनके नेतृत्व में चुनाव लडा गया है। वहीं भाजपा में असमंजस की स्थिति निर्मित हो चुकी हैं। चुनावो के दौरान भाजपा हाईकमान ने प्रधानमंत्री के चेहरे को पोस्टर में लगवाया गया था और यह संदेश दिया था कि मुख्यमंत्री का चेहरा बदल सकता है। भाजपा में मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में शिवराज सिंह चौहान, नरेंद्र सिंह तोमर, प्रहलाद सिंह पटेल, कैलाश विजयवर्गीय, डॉ नरोत्तम मिश्रा के नाम सामने आ रहे हैं।

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