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शरद पूर्णिमा मन की शान्ति और आनन्द प्राप्त करने का भी एक अवसर है : NN81

 स्लग :------शरद  पूर्णिमा मन की शान्ति  और आनन्द प्राप्त  करने का  भी एक अवसर  है।


चन्द्रमा  सोलह कलाओ से परिपूर्ण  होता है।


पृथ्वी  के सर्वाधिक  निकट होता है।


मनावर धार से हर्ष पाटीदार की रिपोर्ट।



विओ :----जीवनदायिनी कल- कल करती हुई मां नर्मदा के उत्तरी छोर पर बसे श्रीबालीपुरधाम में श्री श्री 1008 श्री गजानन जी महाराज की तपस्थली भूमि पर उनके शिष्य संत श्री योगेश जी महाराज के सानिध्य में  शरद  पूर्णिमा मनाई गई । 

       अश्विन मास की पूर्णिमा अन्य पूर्णिमाओ से श्रेष्ठ मानी गई ,क्योंकि इस दिन चंद्रमा की किरणों से अमृत की वर्षा होती है ।शरद पूर्णिमा मन की शांति और आंतरिक आनंद प्राप्त करने का भी एक अवसर है। कहा जाता है इस दिन रात्रि में योगेश्वर श्री कृष्ण जी ने गोपियों के संग महारास रचाया था ।इसी को स्मरण कर पूर्णिमा की रात्रि को उत्सव मनाने की परंपरा अनादिकाल से चली आ रही है। लोग इस रात्रि में योगेश्वर श्री कृष्ण जी का आशीष पाने के लिए विविध उपाय करते हैं। इसे कोजागरी व्रत भी कहा जाता है। स्कंद पुराण में इसे सर्वश्रेष्ठ व्रतो में से एक माना गया है। यह महालक्ष्मी उपासना का भी पर्व है। 

         सनत कुमार संहिता में कहा गया कि इस दिन महालक्ष्मी की आराधना करने वालों पर भी वे प्रसन्न होकर मन को शांति प्रदान करती है और उन्हें धन्य धान्य से परिपूर्ण करती है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार इस समय पृथ्वी पर महालक्ष्मी विचरण करती है। शरद पूर्णिमा पर ध्यान और साधना करने से मन में शांति और संतोष की अनुभूति होती है। यह आत्मा को उच्चस्तर पर पहुंचाने का एक साधन है ।सकारात्मक विचारों को अपने से मानसिक शांति मिलती है ।आयुर्वेद चिकित्सक इस पूर्णिमा की प्रतीक्षा करते हैं जीवनदायिनी रोग नाशक जड़ी बूटियां को शरद पूर्णिमा की चांदनी में रखते हैं। उनके अनुसार अमृत से नहाई  जड़ी- बुटियो से जब दवा तैयार की जाती है तो  वह रोगी के तन पर तुरंत असर डालती है। चंद्रमा को औषधीयो का स्वामी भी कहा गया है ।शरद पूर्णिमा को चंद्रमा 16 कलाओं से परिपूर्ण होने के साथ पृथ्वी  के सर्वाधिक निकट होता है ।माता लक्ष्मी का जन्म भी शरद पूर्णिमा को हुआ था। भगवान कृष्ण और राधा की रासलीला का भी आरंभ इसी दिन हुआ था। भगवान शिव, कार्तिकेय का जन्म भी इसी दिन हुआ था ।उसे कुमार पुर्णिमा भी कहते हैं। 

                श्रीसतगुरु सेवा समिति के जगदीश पाटीदार ने बताया कि शरद पूर्णिमा के दिन रात्रि मे ब्राह्मणों द्वारा श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ किया गया। श्री हनुमान चालीसा का पाठ किया गया। उसके पश्चात श्री महाराज जी ने श्रीफल ,, साल एवम दक्षिणा भेंट की गई। रात्रि मे रोगियों को अस्थमा की दवाई दी गई जो की सुबह 4:00 बजे दूध से बनी खीर पिलाई गई। 5 क्विंटल दूध सभी भक्तों को पिलाया गया। सर्वप्रथम बाबा जी को भोग लगाया गया। बंटी महाराज ,कैलाश महाराज, नवीन महाराज एवम  अन्य  भक्तगण उपस्थित थे।

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